Friday, January 15, 2016

ढलती है शाम।

ढलती है शाम
हर सुबह की
अंश जुडाव बना दिवस का
विभक्त हुआ हर अंश
बिंब उभर आकार पाता
दिवस
नही समता पाते
अंश समय
विभिन्नता देती बोध
अनुभव की शास्वतता
कि बहुआयामी अस्तित्व
पहचान पाये जीवन
हर पल दिन का
अनुभूत क्षणों का
व्यतीत होता
परिणामो का
हिसाब तोलता
भविष्य संवारने निमित्त
ओर भावी छिपा संध्या के
गहन अंधकार बीच
दुख की गहन रजनी
आवरण ढकती जाती
हर परिणामों पर
झीने पर्दे की कालिमा
शून्यता भरती हर उपलब्धि पर
रोशनी कतरों की आस
समय चाहती
नवल प्रभात विकसित
होता स्वयं नष्ट होने पर
दर्द समेटे
रजनी दर्द भोगती
 पीडामय वक्त का
ओर मिटती रहती प्रतिपल
निखरना होता वक्त पर
नहीं परिणाम देते सहारा
सत्य भविष्य मे नही
हर पल सत्य बना
जो है जीवंत
शाम का ढलना भी
है संध्या का आमंत्रण
रजनी का अस्तित्व
प्रभात का बीज बनता
शास्वत जीवन
इसी बीच
वक्त का खेल खेलता
और नित
ढलती है शाम।
छगन लाल गर्ग।