Sunday, January 31, 2016

मिटते बिम्ब।

 हो क्या
अस्तित्व नहीं कहता
झलक सी बनती
कभी पहचान दिलवाती
कभी अनजान बनती
विभ्रान्ति मे स्वयं का अहसास
करता जाता भुलता जाता
क्या समझू जीवन
तुम हो क्या
उन्माद पल अनायास
लगने लगते चिर अपने
रस का सरोवर
उमड घुमड कर
तंरगित जीवन  मे
आनंद देता
 तेरी मोहक मदभरी
मृदुल पहचान
तुम हो क्या
कभी क्लान्त शून्य बने तुम
वेदना नद वेग बहते
हारते रहते हर पल
जीवन का हर पल अमोल
नहीं समझ आता मुझे
जीवन तेरा असली मर्म
तुम हो क्या
घिरना होता अज्ञात
मोहक जाल देते संकेत
मीठे स्वप्न बाँसूरी बन
ध्वनि देते अबाध अविराम
आह सौन्दर्य के अछूये बिम्ब
सलज्ज मुस्कान लिए अनुराग स
मदभरी मुग्धा के मदभरे बोल
डूबती चेतना लेते घोल
घूघराले अलको का बिखराव
विधु मुख का ले आधार
खेलते पवन के झौको संग
आह यह दृश्य जीवन का मोल
सत्य यह भी नही
जीवन का खेल
आखिर तुम हो क्या
अनुभूति जो मैं करता जाता
हर पल तुम मिटाते जाते
नित नयापन अबोध जीवन
नहीं कर पाता परिचय पल का
मिटता हर पल देता जाता
मूक मौन बन संकेत गहरा
नहीं सार केवल हैं आभास जीवन
मिटता केवल बिम्ब जीवन ।
छगन लाल गर्ग।