अभिव्यक्ति का स्वर
रास नहीं आता
विगत जीवन देता टीस
असंख्य गूजरे पल
जहां अनंत कामनाओ के पंख
अधिक पैनापन लिए
भरते रहे उड़ान
विलास मय क्षणो की रमणिय
द्रव्य मान रसधार का
करते रहे पान
अचेतन वासना का आगार
बना जीवन का क्रीड़ा स्थल
ओर पीता रहा निरंतर
कामनाओ से भरा जाम
स्पर्श का नमनीय अहसास
भरता था स्पंदन
यह जीवन था
कामनाओ का अतिसार
नादान भावों को मिलते रहे
झिलमिलाते संगीत चेतना के छाये
आह वह पल
रूप रस गंध का संगम
देह देह की लहरे
ओर उनका बेबाक टकराव
उन्माद पूर्ण ध्वनि
सिहरन देती जाती
आज भी सुसुप्त कामनाओ को
सत्य नहीं जीया मैं
महसूस करता हूँ आज
पावन हृदय मे उठती रही
नित्य अतीत मे
वासना जीती लहरे
आज पीडीत हूँ
आत्म निन्दा के भाव
ओर जब देखता
उपाय निमित्त शास्त्रों की तरफ
काम्प जाता हूँ
भीतर तक
वर्जित जीवन की सूची
के बीचो बीच जीया जीवन
खुद से निन्दित हूँ मैं
ओर यह भाव देते शास्त्र सारे
नहीं समझना होगा
जीवन की सत्यता अनुभूति से
ओर वहीं सोच दे सकेगी
भीतरी गहराई
कि स्वतः उठती जाती
प्रार्थना परमात्मा की
कि वहीं गुजारा जीवन
हुआ जाता निर्मल प्रेम का
पावन दरिया
ओर आत्म निन्दा बन जाती
रागिनी सी देती वीणा स्वर।
छगन लाल गर्ग।
रास नहीं आता
विगत जीवन देता टीस
असंख्य गूजरे पल
जहां अनंत कामनाओ के पंख
अधिक पैनापन लिए
भरते रहे उड़ान
विलास मय क्षणो की रमणिय
द्रव्य मान रसधार का
करते रहे पान
अचेतन वासना का आगार
बना जीवन का क्रीड़ा स्थल
ओर पीता रहा निरंतर
कामनाओ से भरा जाम
स्पर्श का नमनीय अहसास
भरता था स्पंदन
यह जीवन था
कामनाओ का अतिसार
नादान भावों को मिलते रहे
झिलमिलाते संगीत चेतना के छाये
आह वह पल
रूप रस गंध का संगम
देह देह की लहरे
ओर उनका बेबाक टकराव
उन्माद पूर्ण ध्वनि
सिहरन देती जाती
आज भी सुसुप्त कामनाओ को
सत्य नहीं जीया मैं
महसूस करता हूँ आज
पावन हृदय मे उठती रही
नित्य अतीत मे
वासना जीती लहरे
आज पीडीत हूँ
आत्म निन्दा के भाव
ओर जब देखता
उपाय निमित्त शास्त्रों की तरफ
काम्प जाता हूँ
भीतर तक
वर्जित जीवन की सूची
के बीचो बीच जीया जीवन
खुद से निन्दित हूँ मैं
ओर यह भाव देते शास्त्र सारे
नहीं समझना होगा
जीवन की सत्यता अनुभूति से
ओर वहीं सोच दे सकेगी
भीतरी गहराई
कि स्वतः उठती जाती
प्रार्थना परमात्मा की
कि वहीं गुजारा जीवन
हुआ जाता निर्मल प्रेम का
पावन दरिया
ओर आत्म निन्दा बन जाती
रागिनी सी देती वीणा स्वर।
छगन लाल गर्ग।