बदल रहा हर पल
नित नये मापदंड लेकर
संस्कार पर होने लगे अब तर्क
विशुद्धता के बदलते जाते पैमाने
नाते रिश्ते ले रहे नव युग बोध
खंखाले जाते रिश्तों की गहराई
आंकनी होती आवश्यकता
ओर सामाजिक जरूरत पर
गहरी संवेदना
फिजूल के नही रहे रिश्ते अब
घनिष्ठ रिश्ते भी लेते आकार
मतलब के मापक पर
कांपने लगे है मजबूत घनिष्ठ रिश्ते भी
घनी हवा में कांपते वृक्ष के पत्तो की तरह
निर्भर नही गहराई पर रिश्ते
नही खुद रखते अपनी पकड
धन दौलत ओर सुख पर निर्भर
बूरे वक्त की तरह
बदलाव लाते
पत्नी का तलाक
सुपुत्र का कुपुत्र होना
ओर शत्रुता की सीमा लांघना
नये युग का प्रगति मय तोहफा
अब यह जीवन
नही पाता कही रिश्तों का विश्वास
सब कुछ होते भी
नही करता विश्वास अब
कौन हमारा ।
छगनलाल गर्ग ।
नित नये मापदंड लेकर
संस्कार पर होने लगे अब तर्क
विशुद्धता के बदलते जाते पैमाने
नाते रिश्ते ले रहे नव युग बोध
खंखाले जाते रिश्तों की गहराई
आंकनी होती आवश्यकता
ओर सामाजिक जरूरत पर
गहरी संवेदना
फिजूल के नही रहे रिश्ते अब
घनिष्ठ रिश्ते भी लेते आकार
मतलब के मापक पर
कांपने लगे है मजबूत घनिष्ठ रिश्ते भी
घनी हवा में कांपते वृक्ष के पत्तो की तरह
निर्भर नही गहराई पर रिश्ते
नही खुद रखते अपनी पकड
धन दौलत ओर सुख पर निर्भर
बूरे वक्त की तरह
बदलाव लाते
पत्नी का तलाक
सुपुत्र का कुपुत्र होना
ओर शत्रुता की सीमा लांघना
नये युग का प्रगति मय तोहफा
अब यह जीवन
नही पाता कही रिश्तों का विश्वास
सब कुछ होते भी
नही करता विश्वास अब
कौन हमारा ।
छगनलाल गर्ग ।