Sunday, February 28, 2016

पकड ।

बडप्पन का आग्रह
अब नही मांगता अपना हिसाब
शायद भयभीत हुआ जाता
अपनी  उम्र के वजन से
नही रही लायकी
अपने से छोटो पर भाई के हक
जताने की
ओर नही  आवश्यकता
सदगुणों का पाठ पढाने की
समझदारी मे बहुत हैं आगे
अपने बाप से भी
ऐसे में बडे भाई का सुझाव
लगता गालीगलौज की तरह
सत्य कहना भी
हो चुका जोखिम
अपने ही घर हम
होते जाते बेगाने
संबधों का विवेक अब
गहरा रहस्य बना
जहां केवल पकड बनी रस्तों की
आपकी संपत्ति
आपका समर्पण छोटो के प्रति
ओर आप विवश हैं
विकल विपदा से लिपटी
जिन्दगी जीने को
बिना किसी प्रतिक्रया के
बडप्पन का आज
यही रह गया मायना
अब पकड बडप्पन की नही
लडकपन की रही ।
छगनलाल गर्ग ।