Friday, February 26, 2016

गिरने दो ।

तना हुआ अस्तित्व
ठूँठ सा
खूब जीया
चाहना लिए जोश खरोंच के साथ
पद की गरिमा को
खूब चमकाया
एक धौंस भरा मरू रस
असीम कामना से
अहंकार तृप्ति निमित्त
खूब सताया नेक इन्सानियत
धारित कार्मिकों को
एक उठा हुआ
धुँऑ बना रहा
हर किसी की ऑखों में
देता रहा जलन
बहुत अजीब होता यह भी
सर्वस्व का नशा
वर्चस्व की भूख बढाता जाता
जिन्दगी से होता रहता
बहुत दूर
नहीं पहचान पाता
तना हुआ अस्तित्व
तोलता जाता अतीत
व्यर्थ जिन्दगी के क्षण
हारा बेबुझ
आया अंतिम मुहाने
गिरना चाहता हूँ
गिरने दो मुझे ।
छगन लाल गर्ग ।