अब तक नहीं जान पाया
जीवन मेरे तुम कहां हो
कभी नहीं कर पाया
ओरो से अपनी तुलना
शायद सोचना ऐसा भी
जीवन का निर्बल पक्ष
कहीं ठहराव लायक जगह
नहीं पा सका
कि लू श्वास तनिक
उठाऊ नजरें ऊपर की ओर
ओर कर अपने अस्तित्व का मोल
नहीं आ पाये वे पल
मात्र दौड धूप
कि गूजार सकूँ परिवार की उम्मीदें
केवल सहज सामान्य
जिसकी कभी कोई
नहीं देखी गई
ऊँचाई या कि नीचाई
बस हर जगह
एक ही आचरण बिना आवरण
नमन समर्पण
यही सिखा यही जाना
जिन्दगी मेने तुमसे
ओर शायद ठीक हो
यही देता
अलौकिक की शिक्षा का कोष भी ।
छगन लाल गर्ग।
जीवन मेरे तुम कहां हो
कभी नहीं कर पाया
ओरो से अपनी तुलना
शायद सोचना ऐसा भी
जीवन का निर्बल पक्ष
कहीं ठहराव लायक जगह
नहीं पा सका
कि लू श्वास तनिक
उठाऊ नजरें ऊपर की ओर
ओर कर अपने अस्तित्व का मोल
नहीं आ पाये वे पल
मात्र दौड धूप
कि गूजार सकूँ परिवार की उम्मीदें
केवल सहज सामान्य
जिसकी कभी कोई
नहीं देखी गई
ऊँचाई या कि नीचाई
बस हर जगह
एक ही आचरण बिना आवरण
नमन समर्पण
यही सिखा यही जाना
जिन्दगी मेने तुमसे
ओर शायद ठीक हो
यही देता
अलौकिक की शिक्षा का कोष भी ।
छगन लाल गर्ग।