Tuesday, February 9, 2016

आत्म निवेदन

अब तक नहीं जान पाया
जीवन मेरे तुम कहां हो
कभी नहीं कर पाया
ओरो से अपनी तुलना
शायद सोचना ऐसा भी
जीवन का निर्बल पक्ष
कहीं ठहराव लायक जगह
नहीं पा सका
कि लू श्वास तनिक
उठाऊ नजरें ऊपर की ओर
ओर कर अपने अस्तित्व का मोल
नहीं आ पाये वे पल
मात्र दौड धूप
कि गूजार सकूँ परिवार की उम्मीदें
केवल सहज सामान्य
जिसकी कभी कोई
नहीं देखी गई
ऊँचाई या कि नीचाई
बस हर जगह
एक ही आचरण बिना आवरण
नमन समर्पण
यही सिखा यही जाना
जिन्दगी मेने तुमसे
ओर शायद ठीक हो
यही देता
अलौकिक की शिक्षा का कोष भी ।
छगन लाल गर्ग।