Monday, February 15, 2016

धूंधली सांझ।

संध्या का पीलापन
पीडीत हुआ जाता आसमान
चमकता नूर अब लेता जाता
कुछ पीला कुछ श्याम छितकबरा रंग
ओर शनैः शनैः
संध्या का विस्तार फैलता
हो रहा हर प्रकृति का परमाणु कालेपन का शिकार
मेरे कक्ष मे बाहर से अधिक
भरता जाता धुंधलका
शायद कम पाया हूँ समता
कि रख पाऊं रश्मि ऊर्जा
अपने भीतर
चलो आने को आतुर अंधकार
आने दो
शायद यह भी जरूरत हैं मेरी
प्रकृति की तरह
हर रजनी का अस्तित्व स्वीकारती
मिलती घूलती संपूर्ण अस्तित्व
ओर पाती उसी से उसी का विनाश
सूत्र सारवान
कि पुनः हो सके सूर्य का उदय
नये सुख का प्रभात
तानाबाना निर्मित करती जाती प्रकृति
रजनी के गहन भयंकर अंधकार मे
ठीक मिलती जाती सीख
प्रकृति प्रदत
घने रजनी सम दुख मे ही विकसता जाता
सुख जीवन का नवल प्रभात
आओ संध्या स्वागत तुम्हारा ।
छगन लाल गर्ग ।