Monday, February 8, 2016

अनंत हैं द्वार ।

आँकाक्षाऐ नहीं होती बाधित
अनेक कठोर बाधाओ से भी
अस्तित्व का स्वप्न
 पनपने लगता नित नया
ज्ञान की ज्योति
बनती सेतु कि गुजरते रहे
जीवन भर
अगनित पड़े पदचिन्हो को मिटाते
अपने ज्ञान की नयी छाप नया निशा
नयी परिभाषा गढते
बढते जाते आँकाक्षाओ का भार लिए
बंद होते कहीं
कहीं खुलते दरवाजे
सोये भीतर को जगाते
बढ़ते रहते जिन्दगी जीने तुझे
कभी करते तैयारी ऊर्जा लिऐ
ओर कभी करते विसर्जन अहंकार
अज्ञात मे लगाने छलाँग की
अनंत हैं यह यात्रा
जीवन तेरी
अंत अतीत मे सुना नहीं
वर्तमान मे दिखता नही ।
छगन लाल गर्ग।