Monday, February 8, 2016

बहने दो नीर।

उमडते अरमान
कुण्ठित हुए रोना चाहते
रोने दो
मत रोको ऑसूओ को
पीर घनी हुई
बहना चाहती मार्ग तलाशती
होने दो तलाश
स्वयं लेगी राह
आकार मत बनो तुम
पीडा की कसक
बाढ़ बनी बहाव चाहती
बनने दो
भीतर की गंदगी
स्वतः होने दो पावन
अनुठा अवसर हैं यह
पाक साफ होने का
खुद से खुद का
साक्षात्कार
हो जाने दो
रास्ते देते है जीवन को
पावन अमिट रसधार के
जो मिलती जाती
अनंत की ओर ।
छगन लाल गर्ग।