Saturday, February 13, 2016

लंबा रहा सपना।

  अनिश्चय के घेरे मे बंधा
स्पंदन अहसास भरता धैर्य
देता आश्वासन
कि जीवंत हो तुम
लक्षण देते साक्षी जिन्दे हो तुम
ओर समझता रहता
देह की क्रियाशील दशा
अनवरत कार्य करते
स्व विवेक कहां
भीड़ का हिस्सा बना
वहीं करता जाता जो कहते करते
अंधबेहोशी का क्रियाकलाप
जागृति यदि यही तो जागा हुआ
ईश्वरीय कृपा का एहसास करता
अन्यो की भान्ति जीता रहा जिन्दगी
आज से पच्चीस वर्ष पूर्व
कहां थे तुम
तुम्हारे ना होने से क्या शिकवा रहा
मुझे मेरी जिन्दगी से
नहीं शायद नहीं
पच्चीस साल तुम रहे
मेरे अपने बने
अंश बने देह के
एक पच्चीस साल का लंबोतरा सपना
देखा भुगता सुख मिला
अब नही हो तुम चेतन मे
चल दिये विवश रहते
अचेतन मे मिलते तो हो
यह क्या कम हैं
असलियत तो हैं अचेतन ही
चेतन तो मात्र भ्रम
जिसे असलियत समझे
कहने लगे जिन्दगी
नहीं हैं जिन्दगी यह
केवल लंबापन लिए एक सपना
जो टूटना ही हैं एक दिन ।
छगन लाल गर्ग।