Wednesday, February 10, 2016

मत कहना।

आपदा लगातार आती
घेरती जाती
हर क्षेत्र नही रखती स्थान
कि टिक सके कही
कतरा भर लम्हा खुशी
बडी संपत्ति नही
केवल जीवन लायक
मानव कहला सकू
इसी आशा
जीता जाता जिन्दगी के कडवे दिन
कि पाऊँगा किनारा
खुशहाल जीवन का
पर आज तक नही हो पाया
कि कोई कहे
बस बहुत हुआ
खूब देखे दुर्दिन
अब आओ पाओ पुरूस्कार
कुछ प्रसाद स्वरूप
ओर लो स्वाद
चीख पाओ तो चीख लो
यह रही जिन्दगी का अमृत
खुशिया
कुछ कतरे है तुम्हारे भी
जीने लायक
कह सको खुद को मानव
प्रकृति की सम्पत्ति के भागीदार
नही  आ पाया  अवसर
सामर्थ्य वान मानव के रहते
नही हक
सामान्य का
उनकी भाति जीने का हक
नही पाया सामान्य जन ने
जानकारी नही तुम्हे
अपार शक्ति के धनी
आवाज जानते है
किसकी निकली हक चाहते
खतरनाक है
जीवन नही रहेगा फिर
भय का छाया
मंडराने लगेगा
कुछ मत कहना ।
छगनलाल गर्ग ।