Sunday, February 21, 2016

बूझे चिराग।

अब हर पल
होता जाता अहसास
चेतना मे
कि बुद्धि के चिराग मेरे
नहीं जले
भीतर पाता हूँ गहनतम अँधेरा
नहीं पढ पाता
जटिलतम ज्ञान से भरी
सार्थक पुस्तकें
जिनमें छिपे हैं अलौकिक
रोशनी के चिराग
कि दुर्लभ हैं कहीं ओर
किसी अन्य साहित्य मे
इतना पैनापन लिए
विस्तृत सत्य शात्विकता लिए
ज्ञान का भंडार
सुनता हूँ ज्ञानियों से
पर प्रयास सारे
पाता हूँ निष्फल
बहुत कोशिश करता हूँ
बूझे रोशन चिरागो को
पुनः जलाना
पर नहीं पाता बाती भी
ओर ग्रंथों मे छिपी
चेतना को भी
मूर्दे हो चूके चिराग
स्तुति पूजा के बल से भी
नहीं जलते
बूझ चूके हैं चेतना के चिराग ।
छगन लाल गर्ग ।