Sunday, February 21, 2016

ठीक ढंग ।

हाँ निरंतर व्यतीत होता
हर पल देता आकार
स्वयं को
कि बेहतर हो सके जिन्दगी
सिखता हूँ जीना
जिन्दगी का ठीक ढंग
नहीं पाया समझ
अभी तक
यह ढंग जिसे कहा जाय
यह अटल ठीक
क्या कहूँ समझ का
नहीं निखरी कि बखान हो
मिले भी बिछुडे भी
अच्छे बुरे कहाये व्यक्तियों से
कभी हुए प्रभावित
खिंचते चले स्वयं को
उनकी तरफ
भौथरा जाती चमक
जैसे ही जाते पास
नहीं पाया अच्छेपन का रस
ओर जिसमें होती बुराई
होते रहे विकर्षित
बिना खिंचे
दुर दुर से पायी नीरसता
कहां पकड आया सत्य
जीवन का
दोनों ही तरफ का
आकर्षण विकर्षण
नहीं दे पाया जीवन जीने का
ठीक ढंग
शायद नहीं मिला
इतिहास प्रसिद्ध नायक
नायिका से
असली कामयाब जिन्दगी
का हुनर
ओर नहीं संभव भी
स्वयं को जीये
जब सीख लूँगा
स्वयं से स्वयं का जीना
वहीं होगा शायद
जीवन जीने का
ठीक ढंग ।
छगन लाल गर्ग ।