अब नही केवल आशक्त मोह से
कि निहारू तुम्हें अपलक
असीम सौन्दर्य भरा भरा
उठता उठाव का नशा
नहीं लेता अंगडाई
नहीं कहता कि शिथिल हुआ प्रेम
या उसका उन्माद
नहीं बात यह कतई नहीं
बात अब बढ़ चुकी आगे
सौन्दर्य की शात्विक चमक पाने
हुआ हैं कई बार
केवल रसागार डूबते डूबते
बस बस जाता हूँ
अधमरा हुआ इस रूप सागर
नहीं पाता पूर्णता
अधूरा पड जाता हूँ हर बार
तुम्हारे होते
समूचे सौन्दर्य के होते भी
नहीं मिल पाता चैन
तृष्णा को
यह सुख का आना जाना
चुनौती बना हैं तुम्हारा रूप
तुम्हारा सौन्दर्य
अब नहीं आता काम
केवल निहारना ओर मोहासक्त होना
अब सोचता हूँ तुम्हें ।
छगन लाल गर्ग।
कि निहारू तुम्हें अपलक
असीम सौन्दर्य भरा भरा
उठता उठाव का नशा
नहीं लेता अंगडाई
नहीं कहता कि शिथिल हुआ प्रेम
या उसका उन्माद
नहीं बात यह कतई नहीं
बात अब बढ़ चुकी आगे
सौन्दर्य की शात्विक चमक पाने
हुआ हैं कई बार
केवल रसागार डूबते डूबते
बस बस जाता हूँ
अधमरा हुआ इस रूप सागर
नहीं पाता पूर्णता
अधूरा पड जाता हूँ हर बार
तुम्हारे होते
समूचे सौन्दर्य के होते भी
नहीं मिल पाता चैन
तृष्णा को
यह सुख का आना जाना
चुनौती बना हैं तुम्हारा रूप
तुम्हारा सौन्दर्य
अब नहीं आता काम
केवल निहारना ओर मोहासक्त होना
अब सोचता हूँ तुम्हें ।
छगन लाल गर्ग।