बंध जाता जीवन
एक अहसास मे
अपनत्व पाता परिवेश का मोह
अति सम्पर्क का नहीं आगाज
कि बने रहे साथ साथ
अदृश्य रिस्ता लेता जन्म
भावों का घनत्व अणु संग बिखरता
पाता ठावस अपनत्व के भाव
लगते स्वयं के जीवन अंश
बहुत गहन हो जाता जुड़ाव
तन मन का यह एकरस लगाव
बन जाता ऑखो का तारा
अति रमणीय मन भावन
यह मोह का असीम रूप
बन उभरता शात्विक
तो बन जाता नेह
असीम की देने लगता झलक ससीम जीवन मे
प्रथम सौपान बन जाता मोह भी
पावन हृदय के साथ
जहाँ नहीं जन्म लेता स्वार्थ
उत्सर्ग होने की
परम अनुभूति लिए मिटना चाहता
दूसरों के हित
नहीं यहाँ संकीर्णता
विचारों ओर कर्मो मे
उत्सर्जन का भाव नहीं देता
संकीर्ण जीवन
नहीं कह पाता तब केवल मोह
अति शुद्ध हुआ मोह ही
बनता निर्मल पावन परिमल स्नेह
ईश्वरीय अलौकिक नैसर्गिक रमणीय।
छगन लाल गर्ग।
एक अहसास मे
अपनत्व पाता परिवेश का मोह
अति सम्पर्क का नहीं आगाज
कि बने रहे साथ साथ
अदृश्य रिस्ता लेता जन्म
भावों का घनत्व अणु संग बिखरता
पाता ठावस अपनत्व के भाव
लगते स्वयं के जीवन अंश
बहुत गहन हो जाता जुड़ाव
तन मन का यह एकरस लगाव
बन जाता ऑखो का तारा
अति रमणीय मन भावन
यह मोह का असीम रूप
बन उभरता शात्विक
तो बन जाता नेह
असीम की देने लगता झलक ससीम जीवन मे
प्रथम सौपान बन जाता मोह भी
पावन हृदय के साथ
जहाँ नहीं जन्म लेता स्वार्थ
उत्सर्ग होने की
परम अनुभूति लिए मिटना चाहता
दूसरों के हित
नहीं यहाँ संकीर्णता
विचारों ओर कर्मो मे
उत्सर्जन का भाव नहीं देता
संकीर्ण जीवन
नहीं कह पाता तब केवल मोह
अति शुद्ध हुआ मोह ही
बनता निर्मल पावन परिमल स्नेह
ईश्वरीय अलौकिक नैसर्गिक रमणीय।
छगन लाल गर्ग।