Monday, February 8, 2016

कोन हैं सहज ।

नव चेतन नव युग
अति प्रज्ञा अति प्रगति
मनुष्य से भी ऊँचा मनुष्य का ही अस्तित्व
कहता समझता युग
अति सभ्य अति विवेक मय
जीने लगा आधुनिक जीवन
आज का मनुष्य
जितना गया ऊँचा धरातल से
उससे अधिक
ईश्वरीय शक्ति का धनी
समझ बेठा स्वयं
नहीं आती नजर सामान्य दशा
जीता जिसको नित मरता जिन्दगी
आम व्यक्ति
आँकाक्षाओ का जरूरी बौझ लिऐ
गुजार देता
अनपायी तरसती उम्र
केवल सम्पन्नता की चाकरी मे
नहीं पाता धरातल मे
चलने  की ऊर्जा
ओर विवेकी जन ऊपरी युग बने
जीते रहो अलग दुनिया
असल कहूँ
बुरा तो मानोगे पर कहना तो होगा
भौतिक प्रगति का नशा
हमे नीचे ही ले जाता
नही ऊपर का मार्ग
केवल सहजता
हम न तुलनीय बन सकते
उस परम सता के
ओर न बने हैं
यह सता व्यर्थ गुणवत्ता से लिपटी
निस्सार हैं
मनुष्य की सहजता से वंचित
यह जीवन
न स्व अर्थ हैं न स्व धर्म हैं ।
छगन लाल गर्ग।