बार बार प्रिय
अवचेतन मे
समा चुकते
हलचल करते
भाव जगत मे
मेरे बुलाये सुनते कहां तुम
बुलाते बुलाते फिर छुप जाते
हृदय शिराओ के
रक्त प्रवाह मे
अंश तुम्हारी त्वरा ऊर्जा के
चूभते ठहरते
अवरुद्ध हृदय को हर पल
कर देते हो
शापमय जीवन
नित जलता
निष्ठुर स्नेह का
जाप जपता
प्राण हर पल
तुम्हें ही गाता
चेतनामय
राग नित रोता
आओ ना मेरे प्राण रागमय
नहीं संभलता जीवन अब तो
हृदय जलन की ज्वाला घनी रे
आओ मिल कर तपन मे
स्नान ही कर ले
न जिस्म का झंझट
न प्राणो का रोना
पावनता मे दर्द भीगो दे
फिर ना कहूँ मैं
ना तुम भी कहोगे
दर्द देते हो ।
छगन लाल गर्ग ।
अवचेतन मे
समा चुकते
हलचल करते
भाव जगत मे
मेरे बुलाये सुनते कहां तुम
बुलाते बुलाते फिर छुप जाते
हृदय शिराओ के
रक्त प्रवाह मे
अंश तुम्हारी त्वरा ऊर्जा के
चूभते ठहरते
अवरुद्ध हृदय को हर पल
कर देते हो
शापमय जीवन
नित जलता
निष्ठुर स्नेह का
जाप जपता
प्राण हर पल
तुम्हें ही गाता
चेतनामय
राग नित रोता
आओ ना मेरे प्राण रागमय
नहीं संभलता जीवन अब तो
हृदय जलन की ज्वाला घनी रे
आओ मिल कर तपन मे
स्नान ही कर ले
न जिस्म का झंझट
न प्राणो का रोना
पावनता मे दर्द भीगो दे
फिर ना कहूँ मैं
ना तुम भी कहोगे
दर्द देते हो ।
छगन लाल गर्ग ।