Friday, February 12, 2016

खाली हाथ ।

तमाम जिन्दगी का सम्हाला
अनुभव भी ज्ञान भी
भर भरा कर बन गया अति विकट
जीवन को देता जाता आयाम
कभी रहस्यमय बनाता
कभी संघर्ष मय
हर भावना ओर सिद्धांत आरोपित करता
जीवन को समझता भी
अन्य जिज्ञाशाओ को समझाता भी
ऊपर ऊपर देता हूँ अर्थ
जीवन को
अपने ज्ञान की पूर्ण ऊर्जा के साथ
नहीं हुआ तनिक भी खाली
अपनी विद्वता से
पर जब कभी निहारने लगता हूँ
चाँदनी रात
महक भरी हवाऐ
घूला घूला आसमान
बहुत भाता उसके खालीपन के कारण
नीरह पावन स्वच्छ साफ सत्य
नहीं कही बोझ
विचार व भावों भरा
उन्मत स्वच्छन्द विराट विशाल अस्तित्व लिए
आह विस्मृति घेरती मुझे
न विचार बचता
न भाव बचता
हो जाता हूँ मैं खाली
हाँ खाली हाथ
उसी रूप गढ जाता
जिस रूप मे भेजा परम ने मुझे
यही पाता हूँ सार जीवन
खालीपन ही मूल सार
अंतिम सत्य जीवन का।
छगन लाल गर्ग ।