हाँ रूग्ण हूँ मैं
बहुत सी भाव भंगिमा
खूबसूरती की लुभाती मुझे
अनंत प्रेम का आवेग
लेता रहता आकार
अजनबीपन नही पाता सौंदर्य
धडकन नही पूछती कोई पहचान
ओर लब थरथराते कहना कुछ
शब्द अंकुरित प्रेम से
आ ह भरता रह जाता
अंतर मेरा घना पीडित
जर्जर बना तलाश करता
सौंदर्य तेरी
कभी सुन्दर फूल
सुंदर कभी नदियां सुंदर देहें
कभी चांद तारे
हर सौंदर्य में खोया हूँ मैं
ओर बहुत गहरे
करता हूँ अहसास भी
नही हकीकत मे
हकदार मै
असलियत मैं यह सौन्दर्य
मात्र
परमात्मा हैं तेरा
तू ही बहु रूप लिए झलकता
विभिन्नता धारण किए
सत्य तलाशता
आज बन चुका हूँ मैं
रूग्ण चित ।
छगनलाल गर्ग ।
बहुत सी भाव भंगिमा
खूबसूरती की लुभाती मुझे
अनंत प्रेम का आवेग
लेता रहता आकार
अजनबीपन नही पाता सौंदर्य
धडकन नही पूछती कोई पहचान
ओर लब थरथराते कहना कुछ
शब्द अंकुरित प्रेम से
आ ह भरता रह जाता
अंतर मेरा घना पीडित
जर्जर बना तलाश करता
सौंदर्य तेरी
कभी सुन्दर फूल
सुंदर कभी नदियां सुंदर देहें
कभी चांद तारे
हर सौंदर्य में खोया हूँ मैं
ओर बहुत गहरे
करता हूँ अहसास भी
नही हकीकत मे
हकदार मै
असलियत मैं यह सौन्दर्य
मात्र
परमात्मा हैं तेरा
तू ही बहु रूप लिए झलकता
विभिन्नता धारण किए
सत्य तलाशता
आज बन चुका हूँ मैं
रूग्ण चित ।
छगनलाल गर्ग ।