तुम्हें क्या कहूँ
मानव आकार हो
परम भी निकृष्ट भी
विपुल दिव्य संभावनाओ से
भरपूर भी रिक्त भी
मानव तुम
अनंत शिखर भी
ओर अंधेरी गहरी खाई भी
पहचान करू भी कैसे
कि कहां हो तुम
एक तरफ तुम्हारा व्यापक
पसरा उजास
सूर्य सम रश्मियां बिखेरता
ओर दुसरी तरफ
खाई का मौत सा मौन सन्नाटा
तुम कहां हो इनमें
ऊपर नीचे
कहां ढूँढू तुम्हें जानूं मी कैसे
कभी तुम राम कभी रावण
असलियत कहो ना
क्या हो तुम
दानव भी मानव भी
फिर मानव नाम की छाप
साबित करो
मानवता की सुनो ना पुकार
बनो बुद्ध कि महावीर
नीचे मत उतरो
अंधेरे की अंतहीन गहराईयां
खा जायेगी तुम्हें
विक्षिप्त नही विमुक्त बनो
मेरे मानव आओं
हम साथ साथ असीम को चलें।
छगनलाल गर्ग ।
मानव आकार हो
परम भी निकृष्ट भी
विपुल दिव्य संभावनाओ से
भरपूर भी रिक्त भी
मानव तुम
अनंत शिखर भी
ओर अंधेरी गहरी खाई भी
पहचान करू भी कैसे
कि कहां हो तुम
एक तरफ तुम्हारा व्यापक
पसरा उजास
सूर्य सम रश्मियां बिखेरता
ओर दुसरी तरफ
खाई का मौत सा मौन सन्नाटा
तुम कहां हो इनमें
ऊपर नीचे
कहां ढूँढू तुम्हें जानूं मी कैसे
कभी तुम राम कभी रावण
असलियत कहो ना
क्या हो तुम
दानव भी मानव भी
फिर मानव नाम की छाप
साबित करो
मानवता की सुनो ना पुकार
बनो बुद्ध कि महावीर
नीचे मत उतरो
अंधेरे की अंतहीन गहराईयां
खा जायेगी तुम्हें
विक्षिप्त नही विमुक्त बनो
मेरे मानव आओं
हम साथ साथ असीम को चलें।
छगनलाल गर्ग ।