Monday, February 22, 2016

मूर्च्छा हैं जीवन ।

सच कहूँ जीवन मेरे
लंबे अनुभव के बाद
तुम लोभ वस रहे आजतक
तुम्हारा अस्तित्व
मेरे लिए मात्र इतना
कि तुम भरो रिक्तता
बाप दादो से रही खाली खाई
जूटो भरने मे
ओर जब जब भी तुम
आंशिक ही सही
प्रगति मे दिखे
खूब सराहा गया हैं तुम्हें
हर किसी के द्वारा
केवल तुम तुम्हारी आत्मा
खीचे खींचे उदास रहे
परिवार को नाज हैं तुम पर
कि हर आवश्यकता
तुम्हारे रहते होती हैं पूरी
अब तुम अकेले का संताप
नहीं रखता महत्व
तुम्हारी छांव तले
सपने पलने लगे हैं जीवन के
ओर तुम जूटे हो
पूरे मनोयोग से हर हालात मे
किसी भी तरह
लोभ आपूर्ति मे
अब थके हो शायद
भीतर झंकझोरता हैं तुम्हें
सामर्थ्य का भी अंतर आया
पर लालचा बढती निरंतर
यह मेरा लोभ कहां
अंतर्मन की हैं मूर्च्छा
कैसे कहते कि छोडता
नहीं होगा यह
गलत हैं भाषा छोडना
अब तो टूटना होगा तुम्हें
भीतर से
विचारों से भावों से
झांकना होगा
चेतना की गहराईयो में
मानव होने का अर्थ
यदि समय रहते मिल सके ।
छगन लाल गर्ग ।