Tuesday, February 2, 2016

बहने दो।

नहीं करूणालय तनिक जगह
अविरल घनत्व लहरों का प्रवाह
भरता रूग्णमय भव भंवर चाह
आह करूणा कसक नीर प्रवाह।
                   दयनीय जीवन गति हीन दशा भर
                   नमनीय हृदय व्यथा विचलित मार
                   अंतहीन चिन्तन विरह घीरा हैं भार
                   करणीय कर्म अब नहीं पाते आधार।
गगन गहन घटा घूमने लगी
तपन हृदय ताप बढने लगी
विरह पीघल नद  होने लगी
विचार बंध मे बान्धने लगी।
                   घिर गया हृदय अब विचार बादलों से
                    मिट रहा बोध अपनत्व आत्माज्ञान से
                    मत रोको सुकाल घनघोर अंधकार से
                   विरह राग विकल होकर बहता हृदय से।
रोकना मत तुम ऑसूओ को
व्याकुल हैं मत बान्धो इनको
भीतर के जमे कुडे करक्ट को
बहने दो ऑसू संग प्रवाह को।
                    ऑधी पीछे का आक्रोशित बरसात
                    ज्वलंत तपन बदलता होता प्रशान्त
                   ताजगी प्रकृति ले होती ग्राह्य स्नात
                    मत करना हृदय अब तनिक उत्पात।
विरह ऑसू गतिमान जब होते हैं
भीतर विरल ही सघनता पाता हैं
ऑसू नयन मग संकेत दर्द देते हैं
अदृश्य रसधार खबर भी देता हैं ।।
छगन लाल गर्ग।