समेटने लगता फूल
अपनी पंखुरियां
विकसा सौंदर्य समेट लेता
अपने मे
नही विलुप्त की दशा
एक शिथिल अलसाई
समय की तरंग
डालती अपनी छाया
प्रकाश रश्मियां
सिमटती जाती वक्त की मार
पर यह गति का क्रम
नही बंधा किसी नियति
एक प्रकृति का संतुलन
नियम बन घेरता जग जीवन
संयमित सचेतन
ठीक मानव चित दशा की तरह
नही है आरोपित संयम
यह सूर्यास्त की तरह
सिमटता आनंद भरा ठहराव
जिसमे छिपा
अन्तर्मन की वीणा का संगीत
एक विधेयक ऊर्जा
जो सूर्यास्त से संचित
प्रबल शक्ति का संचय कर
प्रकट होती
सूर्योदय बनकर
कि फिर नव मधु यौवन लिए
खिल उठे
कोई मदमाती कली
मेरा संयम तत्पर हुआ जाता
पुनः नव निर्माण होकर ।
छगनलाल गर्ग ।
अपनी पंखुरियां
विकसा सौंदर्य समेट लेता
अपने मे
नही विलुप्त की दशा
एक शिथिल अलसाई
समय की तरंग
डालती अपनी छाया
प्रकाश रश्मियां
सिमटती जाती वक्त की मार
पर यह गति का क्रम
नही बंधा किसी नियति
एक प्रकृति का संतुलन
नियम बन घेरता जग जीवन
संयमित सचेतन
ठीक मानव चित दशा की तरह
नही है आरोपित संयम
यह सूर्यास्त की तरह
सिमटता आनंद भरा ठहराव
जिसमे छिपा
अन्तर्मन की वीणा का संगीत
एक विधेयक ऊर्जा
जो सूर्यास्त से संचित
प्रबल शक्ति का संचय कर
प्रकट होती
सूर्योदय बनकर
कि फिर नव मधु यौवन लिए
खिल उठे
कोई मदमाती कली
मेरा संयम तत्पर हुआ जाता
पुनः नव निर्माण होकर ।
छगनलाल गर्ग ।