Saturday, February 13, 2016

पढ़ो प्रकृति को ।

एकाग्रता से विमोहित यह जीवन
चाहत लिए अदृश्य को देखना
भटकाव मे बीतता जाता
ओर निरन्तर खोजने लगता हूँ
गहनतम विचारों के जनक
मानव जीवन के मीमाशंक विद्वान
ओर उनकी रचित रचनाएँ
नहीं पाता तुष्टि या कि तृप्ति
विचार लगते ऊबाऊ
बेअर्थ मृत निष्प्राण
नहीं है उष्मा की तपीस
कि जीवन के विचारों को पीघला सके
दे सके आकार जीवन को
नहीं नहीं
छलावा हैं पुस्तकें ज्ञान भरी
कुछ भी नही जीवन दायी
तलाश करनी बाकी रही
अभी तक
शास्त्र ज्ञान दुर्गंध से भरा हैं
पढना होगा गगन
शून्य घीरा अनंत वहीं शास्त्र
वहीं मंत्र
शास्त्रों के शब्द खुद भ्रान्त हैं
भटकाव ओर पागलपन का संमिश्रण
नहीं रहस्यमय विराट का
कोई संकेत
कोई कतरा कोई चमक कहीं चिन्गारी की झलक
नहीं नहीं कुछ भी नहीं
केवल भ्रम सागर मे डूबना
कुछ भी नहीं
इस सब के अतिरिक्त
छेद वाली नाव हैं शास्त्र
काफी हैं अस्तित्व डूबोने मे सहायक
समझना होगा
अस्तित्व का बनना मिटना
जन्म ओर मृत्यु
वहीं कहीं छीपा हैं सार पढने लायक
या कि अमृत का द्वार ।
छगन लाल गर्ग ।