जुडाव ही तो
चाह हैं
मेरी इस जीवन
प्रकृति तेरी
नहीं रख पाता दुराव
हर पल हर क्षण समन्वय
चाहता तुझसे
कि परिपूर्णता पा सकूँ
निमग्न नहीं घूलनशील हूँ
मिट जाना चाहता
प्रकृति तेरे हर कण मे
गुम होना चाहता
समूचा देह मन प्राण
केवल तुझमे
पोछना चाहता
परत दर परत जमा
मेरे भीतर गहन अहंकार
संवेदना दो मुझे
मेरे सागर मेरे पर्वत
मेरी नदियों
खुली ऑखों देखता
विराट प्राकृत दृश्य
पहचान लो मुझे
मैं तुम्हारा अंश
सागर नदियों की बूँद
पर्वतों का अंश भी
निर्झर भी
नहीं कहीं विलग अस्तित्व
मिटने दो मुझे
विलय हो जाने दो
तुम्हारा ही अमूर्त आकार
प्रकृति की छाया ।
छगन लाल गर्ग ।
चाह हैं
मेरी इस जीवन
प्रकृति तेरी
नहीं रख पाता दुराव
हर पल हर क्षण समन्वय
चाहता तुझसे
कि परिपूर्णता पा सकूँ
निमग्न नहीं घूलनशील हूँ
मिट जाना चाहता
प्रकृति तेरे हर कण मे
गुम होना चाहता
समूचा देह मन प्राण
केवल तुझमे
पोछना चाहता
परत दर परत जमा
मेरे भीतर गहन अहंकार
संवेदना दो मुझे
मेरे सागर मेरे पर्वत
मेरी नदियों
खुली ऑखों देखता
विराट प्राकृत दृश्य
पहचान लो मुझे
मैं तुम्हारा अंश
सागर नदियों की बूँद
पर्वतों का अंश भी
निर्झर भी
नहीं कहीं विलग अस्तित्व
मिटने दो मुझे
विलय हो जाने दो
तुम्हारा ही अमूर्त आकार
प्रकृति की छाया ।
छगन लाल गर्ग ।