जीवन नहीं अपनत्व की लकीर
कि चलता रहे अबाध गति
सरल सीधी रेखा
नहीं होती राह की कदम ना थके
मंजिल पहुँच तक
उबड खाबड रास्ते
ओर अनचाहे गर्त अंधेरे मे घेरते
हो जाता कठोर तनाव
जीवन मृत्यु बीच
चलता जाता संघर्ष का छाया
प्रति राह हर मंजिल तलाश मे
क्या यही मान चले
जीवन सत्य
जहाँ हताशा निराशा ओर उपेक्षा
नित विश्राम लेती जीवन की राह
नहीं पा सकता
जिन्दगी गुजारा का खर्चा
सपने अधर नहीं कहते
हृदय नहीं सुनते
अजीब सन्नाटा जीने लगा हूँ जिन्दगी तुझे
जिम्मेदार हूँ
अपनो का परिवार का ओर मित्रो का
सभी कामना करते
उतम राह पाऊ
चल पडू गति मय बाधाओं को चीरता
शायद यही विचार थे अबतक मेरे भी
पर अनुभव से पाया
सिखने को आया
हर बाधा संघर्ष नहीं मागती
चाहती है समन्वय
कि एकरसता हो विपरीत के साथ भी
सम विषम मिलकर
पूर्ण आकार पाती हैं जिन्दगी ।
छगन लाल गर्ग ।
कि चलता रहे अबाध गति
सरल सीधी रेखा
नहीं होती राह की कदम ना थके
मंजिल पहुँच तक
उबड खाबड रास्ते
ओर अनचाहे गर्त अंधेरे मे घेरते
हो जाता कठोर तनाव
जीवन मृत्यु बीच
चलता जाता संघर्ष का छाया
प्रति राह हर मंजिल तलाश मे
क्या यही मान चले
जीवन सत्य
जहाँ हताशा निराशा ओर उपेक्षा
नित विश्राम लेती जीवन की राह
नहीं पा सकता
जिन्दगी गुजारा का खर्चा
सपने अधर नहीं कहते
हृदय नहीं सुनते
अजीब सन्नाटा जीने लगा हूँ जिन्दगी तुझे
जिम्मेदार हूँ
अपनो का परिवार का ओर मित्रो का
सभी कामना करते
उतम राह पाऊ
चल पडू गति मय बाधाओं को चीरता
शायद यही विचार थे अबतक मेरे भी
पर अनुभव से पाया
सिखने को आया
हर बाधा संघर्ष नहीं मागती
चाहती है समन्वय
कि एकरसता हो विपरीत के साथ भी
सम विषम मिलकर
पूर्ण आकार पाती हैं जिन्दगी ।
छगन लाल गर्ग ।