Saturday, February 27, 2016

कैवल्य ।

नही लगता
अपना कोई भरे घर में
अहसास होता जाता
बहुत दूर हूँ अपनों से
उम्र का संग्रहण
विकार भरा
असमर्थ रह जाता स्वयं
अपने तन से
हर कार्य पर मोहताज हुआ
यह जीवन
एकांत सुहाना लगता
नजारे उठती अनंत की तरफ
बहने लगते है आँसू
ढूँढने लगता हूँ अनंत मे
आशा से भरी रश्मियां
परम सुंदर लगता जाता
यह असीम आलौक
बस यह अकेलापन
अनंत भी विरान भी
नही कोई ओर
ओर अहसास पाता हुआ
स्वयं भी
डूबता होता जाता शून्य
यह बाहर का एकांत
होता जाता
भीतर का एकांत
शायद यही दशा
कैवल्य ।
छगनलाल गर्ग ।