Saturday, January 30, 2016

हिस्से ।

आस्था का प्रश्न
भीतर तक रखता
संवेदना बहाव
शनिचर देवता के मंदिर
बढाता हूँ कदम
शनिवार हैं आज
अच्छा रहेगा
तेल सिन्दूर चढा सकूँ
चौराहे पर
हाथ फैलाये भिखारी
अनदेखा कर बढता हूँ आगे
चाय की तलब लिए
मंदिर के ठीक सामने
हाथ जोडे खड़ा
भगवे वस्त्र मे बूढ़े की लाचारी
चाय के लिए
अनायास जेब से
संचित रुपये
देता हूँ साधु को
बढता हूँ मंदिर की सीढ़ियाँ
खाली सा
बिना तेल सिन्दुर
हनुमानजी मंदिर के हिस्से
अलग किए
दस का नोट
रख देता हूँ भंडार पेटी मे
पछताता आता हूँ
हनुमान मंदिर
करता हूँ विनती
प्रभु भूल माफ करना
आपस की बात ठहरी
आधा हिस्सा
बिना लडे झगड़े
शनिचर देवता से
आप अवश्य ले  लेना
मुझे माफ कर देना।
छगन लाल गर्ग।