Sunday, January 24, 2016

विकृति।

अहं जीता जीवन
व्यक्ति नहीं रहता
ऊपर उठा तना
 बन जाता सूखा ठूंठ
संवेदना हीन पत्थर बना
वही भाते अपने ही तन
अस्तित्व लेते कीडे
जो नित्य करते जाते
खोखला सार हीन
गुदगुदाते तन उसके
स्पंदन की सार्थकता
समझ लेता जीवन की पूंजी
स्वयं चेतना शून्य
अकड ले डूबती
सूक्ष्म बनी जीवन की गति
ओर यूं ही सरल जीवन
जटिल पृष्ठभूमि घीरा
हो जाता विकृत
अहं की मरूभूमि
जीवन रस सोखती
मत होने दो
जीवन का पतन
स्वाभाविक सरल व्यक्तित्व
असल नमनीय
बहता जीवन सरितामय
स्पर्श पाये
निखर उठते मुरझाये कुसुम
छोडों अहंकार
विकृति मानव यहीं।
छगन लाल गर्ग।