सन्नाटा छायी जिंदगी
नहीं रह सकती निष्क्रिय
तलाश करती रोशनी के कतरे
अनंत बिखरे
समेटे भरती झोली
लगातार अनजाने अविश्वास भरे
नही देता साक्ष्य कोई
कि होगे काम लायक
भरता भी तरासता भी
बेबूझ बना
अब नहीं आवश्यक
क्षमता का विकास हो कैसे
चाहे बिना
रहना चाहता निर्लिप्त
उच्च क्षमता सामान्य हो जाती
पास आते ही सामान्य के
मात्र काम मेरा
शब्दों ओर अर्थों से
उत्पन्न विकार
क्षण बोध तले रखता
गूंथना चाहता सत्य की माला
नीज जन्मी क्षण व्यथा को
देता जाता बिंब
अब सौंदर्य प्रेमी नही पाते
रसानन्द तो
करें क्या ।
छगन लाल गर्ग।
नहीं रह सकती निष्क्रिय
तलाश करती रोशनी के कतरे
अनंत बिखरे
समेटे भरती झोली
लगातार अनजाने अविश्वास भरे
नही देता साक्ष्य कोई
कि होगे काम लायक
भरता भी तरासता भी
बेबूझ बना
अब नहीं आवश्यक
क्षमता का विकास हो कैसे
चाहे बिना
रहना चाहता निर्लिप्त
उच्च क्षमता सामान्य हो जाती
पास आते ही सामान्य के
मात्र काम मेरा
शब्दों ओर अर्थों से
उत्पन्न विकार
क्षण बोध तले रखता
गूंथना चाहता सत्य की माला
नीज जन्मी क्षण व्यथा को
देता जाता बिंब
अब सौंदर्य प्रेमी नही पाते
रसानन्द तो
करें क्या ।
छगन लाल गर्ग।