Tuesday, January 12, 2016

सर्द झौका।

सर्द झौकें
कर जाते हो
प्रवेश बंद कमरे भी
आत्मसात हुआ तुमसे
हर पल
जीता जाता ठिठुरन तुम्हारी
निगाहें उठाये
करता पुनरार्वलोकन
कमरे का
ढूंढता जगह
जहां से करते हो प्रवेश
नहीं पाता कोई छिद्र
केवल देते अहसास
ठिठूरन लिए
अभावों की तरह
हर प्रयास सक्रिय हुआ
करने पर नहीं जाता
अभावों का सिलसिला
तुम्हारी तरह
तुम रहोगे
साबित हुआ अस्तित्व तुम्हारा
तुम्हारी छाया कंपन देती
तन भी मन भी
होता जाता व्याकुल
देखो ना बाहर
सूर्य की रश्मियां
घूली मिली लगती
अंग तुम्हारे
बना देते हो मौन समझौता
मेरी तरह
कि जी सकू झेले अभाव
श्वास लेने खातिर
नहीं छूटता मोह
अभाव जीती जिन्दगी से
महसूस करता
मै तुम्हे
भीतर चलती
धडकनों की तरह
निकलता नित्य बाहर
जीवन रश्मियों की तलाश
रिक्तता लिए
किरणों के जाल बीच
हटा दिया जाता
गेरों की तरह
लेते घेरते समर्थ असीम जगह
नहीं पाता अपनी ठौर
जीने लायक उष्मा पाया
लौटा हूँ
थोडा ही सही
अच्छापन तेरा महसूसता हूँ
तनिक जीवन की ऊर्जा पाया
ठीक आंखों मे ठहरी
काजल की तरह
नही रही शिकायत
ठिठुरन तुमसे
घने है संगी साथी
मेरी तरह
मजबूर है झेलने को
ठिठुरती जिन्दगी
ओर आंशिक ही सही
पाते रहते
अस्फुट आंतरिक रस तेरा।
छगन लाल गर्ग।