Thursday, January 28, 2016

पुख्तापन।

 हर कोई लगा
 इसी उद्योग
आ सके जीवन मे
पुख्तापन
कि लगने लगू भरा भरा
कुछ तना कुछ उभरा हुआ
ओरो से
गुजरता हर लम्हा
नहीं दे पाया संतुष्टि
आज तक
कि कुछ पाया बेहतर
ओरो से
दम मारता
 हाफने लगा हूँ
पुख्तापन पाने तुझे
अहसास हुआ आया तू
मेरे भीतर साहस बना
हाँ ठीक इसी तरह
अब लगता
मजबूत हुआ घूसते
नहीं डरता
मौत देते रास्ते भी
बिना डरे
निकलता
बचता बनाता अपना मुकाम
सपाट जीना
संवेदना हीन जीवन
पुख्त बना देता
सभी रास्ते
रोशनी नही तो क्या
इन्तजाम करते
 जाते अंधेरे अपनी
मतलबी दुनिया का सच
जहाँ रोशनी नहीं
विशाल पुख्तापन छाया बना
घेरता हो जीवन का
अंधकार ओर रोशनी कतरे
बुझाने का हो पुख्ता
इन्तजाम
हर कहीं आज का यह पुख्तापन
घेर चुका आम जिन्दगी
श्वासो का आना जाना
बख्शीस हैं उनकी
शाम ढले तक मोहलत
गुजरते पल
पाते जाते हकीकत
कि यह नासमझी
पुख्तापन की नहीं
हमारी हैं
कि खुली ऑखो देते
न्योता
खुद की हत्या का
कि मरती रहे संवेदना
जीवन भर
यंत्रवत बने भोगते रहे
पुख्तापन।
छगन लाल गर्ग।