जग मोह अंगीकृत हुआ
कारण लिए जीता जिन्दगी
सापेक्ष घनत्व घीरा मोह
तन की चाहत तले
सहयोगी बन चुका मन
नहीं निरपेक्ष नेह
जहां विकसित होता
भीतरी कमल अकारण
पर आधारित
चाहत लिए वासना निमित्त
नहीं नित्य
अलौकिकता लिए
सर्व भूतो के कल्याण निमित्त
मेरा स्नेह स्वार्थ साधक
कहता जाता शात्विक
असली मोह भरा
मात्र स्नेह का अदृश्य कतरा
अंश बन जाता मोह बीच
परिमल निखार पाता
मोह जाल पाश
खिलने लगते अचेतन मे कुसुम
मद देती लौकिक गंध
बन जाती दिव्य सुरभि
पर यह क्षण आता तभी
जब छूटता मोह
प्रेम बन जाता मुक्ति
सर्वस्व सार घूल घूल जाता
जब जाता मोह जाल पाश।
छगन लाल गर्ग।
कारण लिए जीता जिन्दगी
सापेक्ष घनत्व घीरा मोह
तन की चाहत तले
सहयोगी बन चुका मन
नहीं निरपेक्ष नेह
जहां विकसित होता
भीतरी कमल अकारण
पर आधारित
चाहत लिए वासना निमित्त
नहीं नित्य
अलौकिकता लिए
सर्व भूतो के कल्याण निमित्त
मेरा स्नेह स्वार्थ साधक
कहता जाता शात्विक
असली मोह भरा
मात्र स्नेह का अदृश्य कतरा
अंश बन जाता मोह बीच
परिमल निखार पाता
मोह जाल पाश
खिलने लगते अचेतन मे कुसुम
मद देती लौकिक गंध
बन जाती दिव्य सुरभि
पर यह क्षण आता तभी
जब छूटता मोह
प्रेम बन जाता मुक्ति
सर्वस्व सार घूल घूल जाता
जब जाता मोह जाल पाश।
छगन लाल गर्ग।