Saturday, January 30, 2016

लिखने दो।

लिखने दो
चार पंक्तियाँ
तुम्हारे लिए
बिखरावो का वायु
भटकाव देता
समेटने दो थोड़ा
भर लू आहिस्ता से
भीतर
कि स्मृतियों संग
कुछ अंगडाई सुख का
पा जाये अहसास
कहने दो कुछ बोल
अपनत्व भरे
स्मृति बसे जो कहना चाहे
आरजू मत कहो
उन्माद घना
संग पाया अरमान
नेह की लहरों का
उठती हैं उतंग
उठ जाने दो
मिल लेंगी अनंत तक
प्रत्यक्ष न सही
अप्रत्यक्ष ही
न मिले आमने सामने
इतना तो जाने दो
नेही के स्वर
पहुँच पाये कर्ण ताल तक
कह देंगे
सुन लेंगे
भीतर भीतर
संकेत भरे मुस्काते
प्रेमिल राग
कहता इतना सा
शायद ममत्व भरा
शास्वत चेतनमय
तुम बसते हो प्राण
भीतर मे
नहीं जाते
रहते चेतन मे भी
अचेतन बने
हर गतिविधियों मे
रचे बसे
नहीं यादों की
असुविधा
नित स्पंदन पाता
जीता हूँ तुम्हें
नहीं कहता
अदेही हुए भी
देह भूला
महसूस करता
जीवन हूँ मैं ।
छगन लाल गर्ग।