Wednesday, January 13, 2016

जीने लगा।

जीने लगा
असीम कामना
उठता जाता कसमसाहट लिए
वासना का धुआं
गहन अभिप्शा मिलती
धुऐ संग
ओर
करती रहती अस्तित्व
दागित
कलुषता घिरती जीवन
नहीं दमन कर पाता
शात्विक सदाचार
युग की मनमोहिनी सभ्यता रहते
नहीं पाता
अनंत मे कहीं ठौर
कि ठहरू
और लू बोध
समय की दौडती रफ्तार का
जहां अदृश्य बना सत्य
पुकारता जाता
भीतर की
आत्म प्रवंचना का राज
दृश्य यथार्थ का
मोहक अंदाज
नहीं चाहता विलगता
वासनाओ से
जहां नित खिलते
मादक सौन्दर्य लिए फुल
कामनाओ के
नवीनता बन चुकी
आकर्षण जीवन का
मोहक अदाएं
संकेत देती अभिसार का
होता रहता आशक्त
आशक्त दृश्य नहीं होता
कभी अपना
सत्य अज्ञात रहता
ओर पाता जाता
असीम अतृप्ति की वेदना
अप्राप्ति का दर्द
हुआ जाता
जीवन का विकल बोझ
यह दर्दनाक मोहित जिन्दगी
कैसे कहूं नेह भरी
जिसमे बहुत गहरे
छिपा दबा
वासना का कीडा
कुलबुलाहट करता
ओर देता जाता अभिव्यक्ति
 प्रेमिल अभिव्यंञ्जना
शास्वत शब्दों सहारे
भावनामय प्रणय राग
कारण की मंजिल तक
फिर वही
अतृप्ति का राग जीवन का
अनंत की चाह
लेता उडान
जिन्दगी चाहों के घनत्व बीच
निज व्यक्तित्व का सार
होता जाता ओझल
तमाशा बनी जिन्दगी
खेलती जाती खेल
बन वासना की कठपुतली
असलियत तेरी समझू कि
सरकती जाती
समय के अंधेरे विवर की ओर।
छगन लाल गर्ग।