नही चाहता लिखना
केवल कुछ शब्द
तुम्हारे लिए
कि पढ सको रूटीन की तरह
ओर ले सको उपयोग कभी
यदि काम आ सके
समझदारी का विश्लेषण सरल विरल
नही हो सकेगा मुझसे
नही ख्यात ऊँच स्तरीय विद्वता
या कि सम्मानीय डिग्री
कि बन जाए शब्दों का विवेक वृक्ष
ओर देने लगे तुम्हें घनी छाया
विवेक वृक्ष रखता तितर बितर छाया
न दे सकती ठंडक
देती जाती हमें
पवन सा भटकाव
यही प्रवृति विवेक
छाया वृक्ष नही रख पाता स्थित
ओर हिलने लगती विवेकी वृक्ष की छाया
निरंतर हवा के भरोसे हवा के संग
हिलती छाया का भटकाव
भरता जाता खालीपन का अंधेरा
फिर नही मिल पाती रोशन दुनिया
अतृप्त तपिश सी छाया फिर
बनने लगती तर्क
ओर समझदारी के शब्द करते जाते
प्रगति विचार बनकर गूँथते शास्त्र
या बनाते वक्ता
जो बनकर भौपू बजाते निरंतर
यह लक्षण विवेक का
अकड ओर पंख विहीन
शब्दो की उडान मात्र
अहं का रूदन
चलता हर अभिव्यक्ति मे
मै नही कहता शब्द कि ढूँढना पडे अर्थ
लुढकाता हूँ नेह का गागर
केवल अंतरतम की समूची रागिनी लिए
कि झूमने लगो तुम आनंद रस मे
विवेक का रूदन ना घेर सके तुम्हे
हो सको मुक्त
दीवानेपन की अंतिम पराकाष्ठा तक
भूले बिसरे अतीत से मुक्त होकर
पहचान सको
अपना स्व अपना अस्तित्व
यही लिखता हूँ मैं
कैसे कह सकते तुम इसे केवल शब्द ।
छगन लाल गर्ग ।
केवल कुछ शब्द
तुम्हारे लिए
कि पढ सको रूटीन की तरह
ओर ले सको उपयोग कभी
यदि काम आ सके
समझदारी का विश्लेषण सरल विरल
नही हो सकेगा मुझसे
नही ख्यात ऊँच स्तरीय विद्वता
या कि सम्मानीय डिग्री
कि बन जाए शब्दों का विवेक वृक्ष
ओर देने लगे तुम्हें घनी छाया
विवेक वृक्ष रखता तितर बितर छाया
न दे सकती ठंडक
देती जाती हमें
पवन सा भटकाव
यही प्रवृति विवेक
छाया वृक्ष नही रख पाता स्थित
ओर हिलने लगती विवेकी वृक्ष की छाया
निरंतर हवा के भरोसे हवा के संग
हिलती छाया का भटकाव
भरता जाता खालीपन का अंधेरा
फिर नही मिल पाती रोशन दुनिया
अतृप्त तपिश सी छाया फिर
बनने लगती तर्क
ओर समझदारी के शब्द करते जाते
प्रगति विचार बनकर गूँथते शास्त्र
या बनाते वक्ता
जो बनकर भौपू बजाते निरंतर
यह लक्षण विवेक का
अकड ओर पंख विहीन
शब्दो की उडान मात्र
अहं का रूदन
चलता हर अभिव्यक्ति मे
मै नही कहता शब्द कि ढूँढना पडे अर्थ
लुढकाता हूँ नेह का गागर
केवल अंतरतम की समूची रागिनी लिए
कि झूमने लगो तुम आनंद रस मे
विवेक का रूदन ना घेर सके तुम्हे
हो सको मुक्त
दीवानेपन की अंतिम पराकाष्ठा तक
भूले बिसरे अतीत से मुक्त होकर
पहचान सको
अपना स्व अपना अस्तित्व
यही लिखता हूँ मैं
कैसे कह सकते तुम इसे केवल शब्द ।
छगन लाल गर्ग ।