दिक्कत तुम्हें अपने होने की
इसमें व्यर्थ घसीटते मुझे
तुम्हारा होना तुम्हारी वजह
अस्मिता का मापदंड तुम्हारा
क्या हो क्या नही
बेहतर जानते तुम मेरे से विशुद्ध
बिना मिलावट का अस्तित्व
केवल तुम्हारा पहचाना
मैं जो झलकता हूँ कभी कभार तुममे
वह कहां हूँ सत्य
अस्वाभाविक सजा संवरा व्यक्तित्व लेकर
देता हूँ छाया अपनी
अदृश्य संग साम्य बनाता हूँ अनमेल होते भी
केवल बाहर के लक्षण लेकर
कि देखो तुम यह दिव्यता का खेल मेरा
सब कुछ भ्रामक अस्वाभाविक
नही देता स्वाभाविक पहचान तुम्हें मैं
ओर मुझे भी कहां देते तुम्हारा असलीपन
हम दोनो होना चाहते श्रेष्ठ
एक दूसरे से बढ चढ कर
ओर यही इजहार करते कितने दूर हो चुके
अपनेपन से
अनसिखेपन की दुनिया जो स्वाभाविक
हमारी अपनी मौन भीतर की यात्रा
बिल्कुल शुद्ध स्वाभाविक
नही रही अपनी
अस्तित्व से दूर विभ्रांत जीवन मे
मेरा तुम्हारा जीवन
अहसास करता दिक्कत खुद के होने की ।
छगन लाल गर्ग ।
इसमें व्यर्थ घसीटते मुझे
तुम्हारा होना तुम्हारी वजह
अस्मिता का मापदंड तुम्हारा
क्या हो क्या नही
बेहतर जानते तुम मेरे से विशुद्ध
बिना मिलावट का अस्तित्व
केवल तुम्हारा पहचाना
मैं जो झलकता हूँ कभी कभार तुममे
वह कहां हूँ सत्य
अस्वाभाविक सजा संवरा व्यक्तित्व लेकर
देता हूँ छाया अपनी
अदृश्य संग साम्य बनाता हूँ अनमेल होते भी
केवल बाहर के लक्षण लेकर
कि देखो तुम यह दिव्यता का खेल मेरा
सब कुछ भ्रामक अस्वाभाविक
नही देता स्वाभाविक पहचान तुम्हें मैं
ओर मुझे भी कहां देते तुम्हारा असलीपन
हम दोनो होना चाहते श्रेष्ठ
एक दूसरे से बढ चढ कर
ओर यही इजहार करते कितने दूर हो चुके
अपनेपन से
अनसिखेपन की दुनिया जो स्वाभाविक
हमारी अपनी मौन भीतर की यात्रा
बिल्कुल शुद्ध स्वाभाविक
नही रही अपनी
अस्तित्व से दूर विभ्रांत जीवन मे
मेरा तुम्हारा जीवन
अहसास करता दिक्कत खुद के होने की ।
छगन लाल गर्ग ।