Friday, June 17, 2016

तुम्हारा होना

दिक्कत तुम्हें अपने होने की
इसमें व्यर्थ घसीटते मुझे
तुम्हारा होना तुम्हारी वजह
अस्मिता का मापदंड तुम्हारा
क्या हो क्या नही
बेहतर जानते तुम मेरे से विशुद्ध
बिना मिलावट का अस्तित्व
केवल तुम्हारा पहचाना
मैं जो झलकता हूँ कभी कभार तुममे
वह कहां हूँ सत्य
अस्वाभाविक सजा संवरा व्यक्तित्व लेकर
देता हूँ छाया अपनी
अदृश्य संग साम्य बनाता हूँ अनमेल होते भी
केवल बाहर के लक्षण लेकर
कि देखो तुम यह दिव्यता का खेल मेरा
सब कुछ भ्रामक अस्वाभाविक
नही देता स्वाभाविक पहचान तुम्हें मैं
ओर मुझे भी कहां देते तुम्हारा असलीपन
हम दोनो होना चाहते श्रेष्ठ
एक दूसरे से बढ चढ कर
ओर यही इजहार करते कितने दूर हो चुके
अपनेपन से
अनसिखेपन की दुनिया जो स्वाभाविक
हमारी अपनी मौन भीतर की यात्रा
बिल्कुल शुद्ध स्वाभाविक
नही रही अपनी
अस्तित्व से दूर विभ्रांत जीवन मे
मेरा तुम्हारा जीवन
अहसास करता दिक्कत खुद के होने की
छगन लाल गर्ग