Monday, June 13, 2016

अंधेरे उजाले

अंधेरे उजाले का चक्र भटकाव देता हैं।
कभी इधर तोकभी उधर मन ढूँढता हैं।
सुख रोशनी मे या कि अंधेरे छिपा हैं।

हताश हू तभी जब कहीं मिला नहीं हैं ।
प्रतीक बने सृजन के रात दिन ।
लक्षण नहीं दिखते संताप मन।
सत्य यह आज का बढी तपन।
सुख प्रतीक खो चुके निजपन।
ताप जल उठे हैं सुख उपवन।
न सुख दिन रात रहता जीवन।
अब सत्य यही जीवन उत्पीड़न ।
काल सीमा टूटे हुआ उन्मूलन ।
रात दिन दर्द भोगे जनजीवन ।