बहुत बार आये याद
जमीं कहां अब रही तुम्हारी
अकथ अज्ञेय हो चुका विस्तार तुम्हारा
नही रह सके हम से स्थूल मूर्त
चल दिए बिना कहे अपने राह
सारी अभिलाषाओं से तोडा बेरहम बन
कहां से सिखा यह बर्ताव
ऐसे तो न थे तुम
यह अनभिज्ञ जीवन अपने से बहुत दूर
कैसे रह पाता संसारी बनकर
सच कहना इतनी जल्दी थी तभी
ढेर सा स्नेह एक साथ बांटते रहे
ओर हर मुस्कान मे देते रहे सत्य
शरीर नही होने का
नन्ही सी उम्र मे इतनी दिव्य झलक
छोड गये हमारे लिए
ओर हम यह दुर्गंध भरी जिंदगी
जीते जा रहे केवल तुम्हारी याद संजोए
आते रहो तुम निरंतर
करते रहो हमारी युग व्यथा को लघु आकार
कि वहन कर जीवन जी सके तुम्हारे बिना ।
छगन लाल गर्ग ।
जमीं कहां अब रही तुम्हारी
अकथ अज्ञेय हो चुका विस्तार तुम्हारा
नही रह सके हम से स्थूल मूर्त
चल दिए बिना कहे अपने राह
सारी अभिलाषाओं से तोडा बेरहम बन
कहां से सिखा यह बर्ताव
ऐसे तो न थे तुम
यह अनभिज्ञ जीवन अपने से बहुत दूर
कैसे रह पाता संसारी बनकर
सच कहना इतनी जल्दी थी तभी
ढेर सा स्नेह एक साथ बांटते रहे
ओर हर मुस्कान मे देते रहे सत्य
शरीर नही होने का
नन्ही सी उम्र मे इतनी दिव्य झलक
छोड गये हमारे लिए
ओर हम यह दुर्गंध भरी जिंदगी
जीते जा रहे केवल तुम्हारी याद संजोए
आते रहो तुम निरंतर
करते रहो हमारी युग व्यथा को लघु आकार
कि वहन कर जीवन जी सके तुम्हारे बिना ।
छगन लाल गर्ग ।