जब कभी भी तुम्हें
कहना चाहता
कहां सुनते तुम
बडे बेदर्द बेरहम हो
गुजर जाते अनछुए मुझे
ओर मैं अंधी आशा लिए
पिरोया करता हूँ
सपनों की कडियां
कि होगा मेरा भी अपना सोचा
पर यह जीवन बडा जटिल
कहां हम कर्ता
केवल निमित्त बडा महत्व
शब्द भी देते
यहां नही कहता शब्द
केवल तुम्हारा
ओरों को भी
निमित्त शब्द समेटता
अपने में
मेरे मन माफिक मित
तुम मत बनो निमित्त
कि मैं खोने लगूँ
अपनापन
एक राग
अदृश्य आवेशित
अज्ञेय लेता जन्म ओर
जब अहसास करता मैं
तुम्हारा
ओर वह क्षण
कहा होता सिर्फ मेरा
उसमे विलय होते तुम भी
मेरे अस्तित्व संग
तुम अदृश्य बन
विश्वास जग चक्षु
कहां देती साक्ष्य
हमारे विलय का
नही मिट पाता द्वेत
संसार पदार्थ जीता
ओर हमारा तुम्हारा यह राग
नही पदार्थ
कि पहचाना जा सके
स्थूल से
मेरा अस्तित्व केवल
यातना जीता
तुम्हारे बेदर्दी के जख्म
रीसते बहते
भीतर भीतर अदृश्य
जाते हो पर सुनते जाओ
मेरी यह यातना तुम्हारी
मेरे जीवन के बहुमूल्य क्षण
झेलता हूँ वेदना बिना झुके
ओर बनाता जाता हूँ
दुख को महान
अडिग हूँ हर वार के बाद भी
तुम्हारे
नही मिटा पाओगे
मेरे मित तुम मुझे
तुम्हारी हर पीडा का आघात
भरता मुझमे नयी ऊर्जा
हर कोशिश तुम्हारी मिटाने की
करता हूँ नाकाम
ओर कहता कहां सुनते तुम
तुम्हारे मारे मैं नही मरूँगा ।
छगन लाल गर्ग ।
कहना चाहता
कहां सुनते तुम
बडे बेदर्द बेरहम हो
गुजर जाते अनछुए मुझे
ओर मैं अंधी आशा लिए
पिरोया करता हूँ
सपनों की कडियां
कि होगा मेरा भी अपना सोचा
पर यह जीवन बडा जटिल
कहां हम कर्ता
केवल निमित्त बडा महत्व
शब्द भी देते
यहां नही कहता शब्द
केवल तुम्हारा
ओरों को भी
निमित्त शब्द समेटता
अपने में
मेरे मन माफिक मित
तुम मत बनो निमित्त
कि मैं खोने लगूँ
अपनापन
एक राग
अदृश्य आवेशित
अज्ञेय लेता जन्म ओर
जब अहसास करता मैं
तुम्हारा
ओर वह क्षण
कहा होता सिर्फ मेरा
उसमे विलय होते तुम भी
मेरे अस्तित्व संग
तुम अदृश्य बन
विश्वास जग चक्षु
कहां देती साक्ष्य
हमारे विलय का
नही मिट पाता द्वेत
संसार पदार्थ जीता
ओर हमारा तुम्हारा यह राग
नही पदार्थ
कि पहचाना जा सके
स्थूल से
मेरा अस्तित्व केवल
यातना जीता
तुम्हारे बेदर्दी के जख्म
रीसते बहते
भीतर भीतर अदृश्य
जाते हो पर सुनते जाओ
मेरी यह यातना तुम्हारी
मेरे जीवन के बहुमूल्य क्षण
झेलता हूँ वेदना बिना झुके
ओर बनाता जाता हूँ
दुख को महान
अडिग हूँ हर वार के बाद भी
तुम्हारे
नही मिटा पाओगे
मेरे मित तुम मुझे
तुम्हारी हर पीडा का आघात
भरता मुझमे नयी ऊर्जा
हर कोशिश तुम्हारी मिटाने की
करता हूँ नाकाम
ओर कहता कहां सुनते तुम
तुम्हारे मारे मैं नही मरूँगा ।
छगन लाल गर्ग ।