जब कभी उदास होता
अतीत का छाया
फिर आता
सारे दल बल के साथ
ओर मेरा तुच्छ अस्तित्व
आये बाये आशा भरी नजरें
ढूँढने लगती हैं बार बार
आसरा अपने का
पर विडंबना जीवन की
अज्ञात कहां हैं
फिर वहीं हताश भाव
ओर यह विरानापन
अपनी विशाल बाहे फैलाये
आगोश मे लेती हैं
ओर मैं
फिर एकबार
समूचा अस्तित्व लिये
समा जाता उसमें
अस्तित्व चाहता
तन्हाई से त्राण
पाना चाहे
शायद निश्छल
मित्रता ।
अतीत का छाया
फिर आता
सारे दल बल के साथ
ओर मेरा तुच्छ अस्तित्व
आये बाये आशा भरी नजरें
ढूँढने लगती हैं बार बार
आसरा अपने का
पर विडंबना जीवन की
अज्ञात कहां हैं
फिर वहीं हताश भाव
ओर यह विरानापन
अपनी विशाल बाहे फैलाये
आगोश मे लेती हैं
ओर मैं
फिर एकबार
समूचा अस्तित्व लिये
समा जाता उसमें
अस्तित्व चाहता
तन्हाई से त्राण
पाना चाहे
शायद निश्छल
मित्रता ।