विपरीत आकांक्षाएं जीने लगा
शरीर चाहता स्वादु भोजन
ऐशोआराम की जिन्दगी
पर अवरोध देता मन का लोभ
अधिक घना कहता जाता
क्या स्वाद संसार के ऐश्वर्य
ओर अधिक घना अलौकिक ऐश्वर्य
कही लुप्त ना हो
चलो चलते नेकी की राह
भोगने का हक होगा स्वर्ग मे
बेहोशी की जिन्दगी जीने लगा
हर अंश जिन्दगी का जीने लगा
खंडित अस्तित्व
अनेकानेक अभिप्सायें घेरे हैं जीवन
कभी चाहता धन अर्जित करना
कभी पद कभी प्रतिष्ठा
कभी चाहता स्वर्ग का इंतजाम
दान पुण्य धर्म कर्म
विपरीत आकांक्षाओं का पिटारा बना
जीवन मेरा नही लगता
जीवन की असलियत का सार
सुनते सुनते बेबूझ रहे प्राण चल देंगे
ओर यह देह
अनुभव हीन विखंडनीय मिट्टी संग
विलय का सार जानने लगी ।
छगन लाल गर्ग ।
शरीर चाहता स्वादु भोजन
ऐशोआराम की जिन्दगी
पर अवरोध देता मन का लोभ
अधिक घना कहता जाता
क्या स्वाद संसार के ऐश्वर्य
ओर अधिक घना अलौकिक ऐश्वर्य
कही लुप्त ना हो
चलो चलते नेकी की राह
भोगने का हक होगा स्वर्ग मे
बेहोशी की जिन्दगी जीने लगा
हर अंश जिन्दगी का जीने लगा
खंडित अस्तित्व
अनेकानेक अभिप्सायें घेरे हैं जीवन
कभी चाहता धन अर्जित करना
कभी पद कभी प्रतिष्ठा
कभी चाहता स्वर्ग का इंतजाम
दान पुण्य धर्म कर्म
विपरीत आकांक्षाओं का पिटारा बना
जीवन मेरा नही लगता
जीवन की असलियत का सार
सुनते सुनते बेबूझ रहे प्राण चल देंगे
ओर यह देह
अनुभव हीन विखंडनीय मिट्टी संग
विलय का सार जानने लगी ।
छगन लाल गर्ग ।