हमारे बाल्यकाल का
प्रसिद्ध खेल
आज नापसन्द गंवार घोषित
कबड्डी कबड्डी
बजा बजा कर रेत मे गुलटियां देते
नही घूँटने देते श्वास
श्वास शक्ति विलय पाकर बन जाती
जीत व्यक्तित्व की
अब नही होता यह खेल
देहाती स्कूलों के अतिरिक्त
शहरीकरण हो चुका
भावनात्मक आनंद का भी
अब तो क्रिकेट का जमाना
जिसमे माटी की पावनता नही
अस्तित्व अंकुरित नेह नही मातृभूमि
ओर बजती तालियाँ करती उद्घोष
विदेशी संस्कृति के संरक्षण का
बडा अजीब है युग का सत्य
अपनत्व भूलते हम
खुद जा रहे विलोपित करने अपनी
मातृभूमि की मर्यादित मान्यतायें
कब लौटेंगे मेरे संस्कृति के दूत
साहित्य कार अपने घर
नव पीढी मे मूल संस्कृति भरने ।
छगन लाल गर्ग ।
आज नापसन्द गंवार घोषित
कबड्डी कबड्डी
बजा बजा कर रेत मे गुलटियां देते
नही घूँटने देते श्वास
श्वास शक्ति विलय पाकर बन जाती
जीत व्यक्तित्व की
अब नही होता यह खेल
देहाती स्कूलों के अतिरिक्त
शहरीकरण हो चुका
भावनात्मक आनंद का भी
अब तो क्रिकेट का जमाना
जिसमे माटी की पावनता नही
अस्तित्व अंकुरित नेह नही मातृभूमि
ओर बजती तालियाँ करती उद्घोष
विदेशी संस्कृति के संरक्षण का
बडा अजीब है युग का सत्य
अपनत्व भूलते हम
खुद जा रहे विलोपित करने अपनी
मातृभूमि की मर्यादित मान्यतायें
कब लौटेंगे मेरे संस्कृति के दूत
साहित्य कार अपने घर
नव पीढी मे मूल संस्कृति भरने ।
छगन लाल गर्ग ।