खूब भागा
व्यस्त समय कब रहा
अपनत्व देय
निरंतर संग्रहण केवल स्थूल सुख
ओर अनंत स्व दुनिया निर्मित हुई
कहता उसे मेरी अपनी
मन के घोडे नही रहे फिर भी
संतुष्ट सुख औध निरंतर विस्तार
करते रहे जीवन के छाया पथ का
ओर आज अनभिज्ञ हूँ
विस्तार का विखंडित रूप
कंकर कचरे के समान उपेक्षित
नितांत ठगा गया
लुटा लुटाया हताश
हताहत प्राण नव बोध लिए
चेतना थक स्वतःशांत हो रही
पुनरूत्थान असंभव अब
ठहराव अस्मिता बना
निश्चलता
अहसास अस्तित्व सा
रूक गया स्वतः
हलचल करती लहरों का
उपद्रव
अच्छा लगता देह संग
चित विश्रांति का स्थगन
केवल शांत दशा नही
ज्ञान दशा
हो गया संतुलित
अब न ऊपर स्थित न ही नीचे
आ चूका मध्य काल मे
अब नही रहा अति बोध
ओर न ही मूढ ता
अब नही बची कोई अति की हो
अहंकार का दावा
न सुख का अहसास न दुख का
विसर्जित हुई ऊर्जा का बहाव
ठहरा सा रूका सा अस्तित्व बन
दौडते अस्तित्व का
विराम काल यह
हलचल सारी
विलीन होती सी मुझमे
पाती आकार नीजपन का
असली बिंब
सौभाग्य का यह क्षण
उतराफाल्गुन
मत गंवा देना
अब फिर मायिक मोह मे
अवसर आया
मत छोड जाना भ्रमित होकर
अंतिम उत्थान ही
जीवन का फल
राह भी रोशनी भी
रब का खजाना भी
केवल यही काल यही काल ।
छगन लाल गर्ग ।
व्यस्त समय कब रहा
अपनत्व देय
निरंतर संग्रहण केवल स्थूल सुख
ओर अनंत स्व दुनिया निर्मित हुई
कहता उसे मेरी अपनी
मन के घोडे नही रहे फिर भी
संतुष्ट सुख औध निरंतर विस्तार
करते रहे जीवन के छाया पथ का
ओर आज अनभिज्ञ हूँ
विस्तार का विखंडित रूप
कंकर कचरे के समान उपेक्षित
नितांत ठगा गया
लुटा लुटाया हताश
हताहत प्राण नव बोध लिए
चेतना थक स्वतःशांत हो रही
पुनरूत्थान असंभव अब
ठहराव अस्मिता बना
निश्चलता
अहसास अस्तित्व सा
रूक गया स्वतः
हलचल करती लहरों का
उपद्रव
अच्छा लगता देह संग
चित विश्रांति का स्थगन
केवल शांत दशा नही
ज्ञान दशा
हो गया संतुलित
अब न ऊपर स्थित न ही नीचे
आ चूका मध्य काल मे
अब नही रहा अति बोध
ओर न ही मूढ ता
अब नही बची कोई अति की हो
अहंकार का दावा
न सुख का अहसास न दुख का
विसर्जित हुई ऊर्जा का बहाव
ठहरा सा रूका सा अस्तित्व बन
दौडते अस्तित्व का
विराम काल यह
हलचल सारी
विलीन होती सी मुझमे
पाती आकार नीजपन का
असली बिंब
सौभाग्य का यह क्षण
उतराफाल्गुन
मत गंवा देना
अब फिर मायिक मोह मे
अवसर आया
मत छोड जाना भ्रमित होकर
अंतिम उत्थान ही
जीवन का फल
राह भी रोशनी भी
रब का खजाना भी
केवल यही काल यही काल ।
छगन लाल गर्ग ।