Monday, March 28, 2016

मूढताऐं मेरी।


कैसे हो सके
मेरी मूढताओं का विश्लेषण
सत्य की आँच बिना
परम सत्ता पहचान बिना
बहुत हूँ खाली खाली
खूब पढ़ा पर
पंडित न हुआ
भ्रम सागर डूबता रहा
कहां छिपा सत्य
हर पुस्तक टटोलता रहा
ओर सत्य
हर पृष्ठ से सरकता
खो जाता शून्य में
होता होगा
सत्य अनुभूति तल
नहीं उतार पाये मूल
पुस्तक मे
केवल छाया बन हुआ
प्रतिबिम्बित
किताबों में महात्माओं की
कभी आधा कभी अधूरा
नहीं पकड़ पाई चेतना
अब तक
कुछ पाया भी
रहा अनपाया ही
लगता जाता
किताबी सत्य कहता
कि सुनो
परमात्मा मांगता
निरंतर बलिदान
कभी राष्ट्र के नाम
कभी धर्म के नाम
कभी जाति की समृद्धि के नाम
बड़ा किमती बौध पाता
आज प्रबुद्ध नीतिज्ञों से
बड़ा अजीब मानव
बन गया हूँ आज मैं
असलियत में जिन्दगी मेरी
नहीं लगता कोई हक हो मेरा
बिल्कुल खालीपन जीना मेरा
तुम चाहो जहां
तैयार हूँ मैं
अपनी देने कुर्बानी
कहीं भी जैसी हो
नीतिज्ञों की इच्छा ।
छगन लाल गर्ग ।