Thursday, March 24, 2016

प्यासा मन।


आह घना प्यासा
संतुष्ट जीवन नहीं तुझसे
हर तृष्णा कहां पाली
कि मनन लाई
आँखों में उभरा बिम्ब
घना सौन्दर्य मय
कमनीय महत्वाकांक्षाओं का
आकर्षक चित भरता
खजाना
आह बहुत सुंदर दिव्य
लुभाते ही होने लगता बेचैन
पाना भरपूर देखना भी
भोगना भी
रूप राशि स्व चेतना से सजल
मन की मुरादों से लबालब
अति गहरे
खूबसूरत भावों से घीरा काम
शायद जरूरत भी
रूप मद गौरव विखण्डित होता
वासना क्षणिक सुख
अहसास पल का
ऊर्जा का रूपांतरण
सिरहनमयी शांत दशा
पर कहां रहा आया रहा
सुख समय
अभी प्यास घनी बढ चुकी
ओध नहीं देता संतुष्टि
यही कारण
जीये जाता हूँ नित्य
लिए सुख महत्वाकांक्षा की गठरी
जीवन घटता जाता
ओर गठरी वासना बढती जाती
समय बढने के साथ
बहुत भारी लगती
चल नहीं पाता इसे उठाये
कांपते हैं पैर
ओर वासना वजन दबाव देता
थका लाचार
ऊपर दृष्टि नहीं पहुँच पाती
अनंत मे रोशनी खोती जाती
किसे सुनाऊँ व्यथा
व्यर्थ रहा जीना मेरा
कसूरवार संपूर्ण मैं क्या
प्रश्न बनाने का नहीं हक मेरा
निश्वास की वायु की आस लिए
जीता जाता हूँ शेष।
छगन लाल गर्ग ।