Monday, March 21, 2016

अटल सत्य ।

ब्रह्मांड ब्रह्म अटल सत्य
अनंत यात्रा पथिक हम
रास्ते सम विषम अनुभूति देते
जटिल बन स्वीकार करते
अपना अहं
ओर यही मिथक गति देता
कदम बढते असत की ओर
मिल जाये राही
अंगी बन जाते अपनत्व भरे
सहारा बनते
कि अनजाना दोष पाकर फिर
तडप प्राण भर बिछुड़ जाते
आह फिर वह वेदना भी
जख्म बन जीवन नासूर देती
स्वप्नवत यह आवागमन
जागना सोना सभी समान
दोनो दशा ब्रह्म रहस्यमयी
हम केवल साक्षी रहे
प्रत्यक्ष पथिक हूँ थका थका सा
अनवरत घना अब तक चलता गया
राहों ने संकेत दिए
अपना अंगी भ्रम मे बिछुड़ गया
सत्य अदृश्य अलौकिक साथ
व्यतीत फिर अंकुरित हुआ
विनोद बन नव अवतरण पाकर
प्रेम पल्लवन शास्वत अवतार लिया
आओ जग के सब मिलकर आओ
राग अमोलक रागिनी गाओं।
छगन लाल गर्ग ।