मिजाज बदल चुका
मौसम
बाहर कटे
वृक्षों की डालियां
अभी नहीं घीरी
पत्तों से
हर बार की तरह
छाया छितरया सा
नहीं दे पाता
घनी छांव
ओर मैं
पहेलु बदलता छाया साथ
खुद भी हो जाता
बदलते छाये के साथ
अपनी जगह बैठा
वृक्ष की छाया
घनी हो उठी यह धूप
ताप का तीक्ष्ण आभास देती
छाया नकारती धूप
ओर मैं नितांत अकेला
उठती नजर देखता
ऊँचे आसमान की ओर
असामयिक बादल
उडते जाते बहुत ऊँचाई पर
देखता हूँ ढकते सूर्य को
ठीक यही दशा
हृदय गगन मे उठते बेजोड़
विचार रूपी बादल
परत दर परत
ढकते जाते आत्मा का शात्विक तेज
नहीं हो सकता पावन
विचारों के रहते
बादलों की तरह अंधकार घेरते
पर यह भी सत्य
हटना होगा इन्हें
ओर हटते ही निखरता सूर्य का उजास
शायद जान सकूँ
विचार शून्यता उपरांत
स्वयं के होने का आनंद ।
छगन लाल गर्ग ।