Monday, March 14, 2016

भीतरी नरक।

अत्यंत लालसा सुख
प्रबल आज युग सत्य
नहीं चैन रात दिन
मात्र चाह भौतिक सुख निमित्त
ओर मकसद का वेग
आँधी सा उजाडता जाता
कच्चे ढहाता घौसले
बेजान सुनसान परसता सन्नाटा
अनेकानेक चहकते जीवन
बिखर बिखर टूटते आँधी की मार
ओर तृष्णा पाती विस्तार
भौतिक सुख
अहसास उसी क्षणों का
घेरता चेतन को
कलुषता भरा नरक विस्तृत
लेता आकार हृदय
बढते सम्पन्नता के मस्तिष्क
खोजता ओर उपाय सुख
ओर यह विज्ञान देता जाता
अलौकिक सम संसाधन
बढते संपन्नता
भीतर बढती जाती विपन्नता
ओर यह बढता रहा
भीतर का विभत्स नरक बना ।
छगन लाल गर्ग ।